हिमाचल के भूले-बिसरे वीर: राजपूत राम सिंह पठानिया की अमर गाथा
"डांगा नी लड़ेया, सौठें नी लड़ेया, लड़ेया वो लेके तलवार लोको कल्लें पठानीएं रण मलैया" ये एक लोकप्रिय गाने के बोल हैं जिसमें हिमाचल प्रदेश के जिला नूरपुर के स्वतंत्रता सेनानी की बहादुरी के बारे में बताया गया है जिन्होंने अंग्रेज़ों के विरूद्ध तलवार उठाने की हिम्मत दिखाई थी।
आज के इस लेख में हम बात करेंगे नूरपुर के उस वीर सपूत की,
जिसने अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने के बजाय तलवार उठा ली — राजपूत राम सिंह पठानिया।
प्रारम्भिक जीवन
वीर सिंह पठानिया जी का जन्म 10 अप्रैल 1824 ई0 में नूरपुर रियासत के राजा वीर सिंह के मंत्री श्याम सिंह के घर हुआ था। राम सिंह जी को बाल्यकाल से ही राजनीति और धर्म की शिक्षा में रूचि थी इसके साथ साथ उन्होंने मार्शल आर्ट, घुड़सवारी एवं तीरन्दाज़ी की भी शिक्षा प्राप्त की। उनका ज्ञात और आलेखित इतिहास वास्तव में प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध की समाप्ति से शुरू होता है जो 1845-1846 के बीच लड़ा गया था।
अंग्रेजों के विरुद्ध शौर्य की शुरुआत
राजपूत राम सिंह पठानिया ने पूर्व तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर रॉबर्ट पील के भतीजे ब्रिटिश अधिकारी जॉन पील को तलवार से मौत के घाट उतारा था।
1857 के विद्रोह को ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध भारतीयों के नेतृत्व में पहले सशस्त्र विद्रोह के रूप में याद किया जाता है किन्तु यह अर्ध-सत्य है क्योंकि 1857 का विद्रोह न तो पहला विद्रोह था और न ही अंतिम उत्तर से लेकर दक्षिण, पूर्व से लेकर पश्चिम, भारतीय ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के बाद से हमेशा अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे।
1857 के विद्रोह या स्वतंत्रता के पहले युद्ध से पहले, भारतीयों ने अपने क्षेत्रों को मुक्त करने के लिए कई बड़े और छोटे पैमाने पर लड़ाई लड़ी। राजपूत राम सिंह पठानिया ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर ब्रितानिया राज के खिलाफ एक सशस्त्र विद्रोह शुरू किया और उन्हें अंदर तक हिला दिया। बहादुर राजपूत राम सिंह पठानिया का वास्तविक इतिहास पहले एंग्लो-सिख युद्ध (1845-1846) के अंत के साथ शुरू होता है। ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध के बाद अंग्रेजों और सिखों के बीच एक संधि हुई थी, जिसके कारण हिमाचल प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों को ब्रिटिश राज ने अपने कब्जे में ले लिया था। माना जाता है कि 9 मार्च 1846 को लाहौर में संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे।
प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के बाद, 1846 में, अंग्रेजों ने नूरपुर सहित हिमाचल प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया। उन्होंने नूरपुर के नाबालिग राजा, राजा जसवंत सिंह, जो अंग्रेजों द्वारा मारे गए राजा वीर सिंह के पुत्र और उत्तराधिकारी थे, को सिंहासन से हटा दिया। उन्होंने उन्हें 5000 रुपये की पेंशन देने की पेशकश की और इस तरह बड़ी चालाकी से नूरपुर पर कब्ज़ा कर लिया। राम सिंह इस अन्याय से क्षुब्ध थे और उन्होंने अंग्रेजों के कब्जे का विरोध करने का फैसला किया। उन्होंने खुद को नूरपुर का वज़ीर घोषित किया और वफादार राजपूत योद्धाओं का एक दल इकट्ठा किया।
इसके बाद उन्होंने ब्रिटिश सेना और उनके सहयोगियों पर कई छापामार हमले किए। उन्होंने कई किलों और गाँवों पर कब्ज़ा कर उन्हें ब्रिटिश अत्याचारी शासन से मुक्त कराया। उन्होंने पंजाब में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे सिखों के साथ भी गठबंधन किया। राम सिंह पठानिया हिमाचल प्रदेश के लोगों के बीच एक लोकप्रिय नेता बन गए और उन्हें नायक माना जाने लगा।
विश्वासघात की कहानी
1848 में, हालाँकि, पहाड़ चंद नाम के उनके ही एक सहयोगी ने उन्हें धोखा दिया और उनके ठिकाने की जानकारी अंग्रेजों को दे दी। अंग्रेजों ने नूरपुर के पास पहाड़ी को घेर लिया और पठानिया को पहाड़ी पर तब फँसा लिया जब वह पूरी तरह से निहत्थे एक धार्मिक अनुष्ठान (पूजा) कर रहे थे। उन्हें गिरफ्तार कर लाहौर जेल ले जाया गया और एक सैन्य अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई और रंगून निर्वासित कर दिया। वहाँ उन्हें कठोर परिस्थितियों और निरंतर शारीरिक और मानसिक यातनाओं का सामना करना पड़ा। 11 नवंबर 1849 को 24 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु ने ब्रिटिश अत्याचार के विरुद्ध उनके वीरतापूर्ण संघर्ष का अंत कर दिया।
यह लेख राजपूत राम सिंह पठानिया जी के लिए मेरी ओर से एक श्रद्धांजली है। हिमाचल के ऐसे वीर सपूत के बारे में पढ़कर मुझे जो ज्ञान मिला उसे पाठकों के साथ साझा करना मैंने अपनी नैतिक जि़म्मेदारी समझी। हिमाचल वीरों की भूमि थी है और रहेगी। मित्रों अगर आपके पास और भी किसी ऐसे गुमनाम हो चुके वीर सपूतों की कोई कहानी है तो कृप्या मेल के माध्यम से बताएं। ये हमारा नैतिक कर्तव्य है ऐसे वीर सपूतों के सच्चाई हम आने वाली पीढ़ी के समक्ष रखें उन्हें धूमिल ना होने दें।
अगर आपको मेरा लेख पसन्द आया तो मुझे अवश्य बताएं और कोई कमी हो तो मुझे अवगत करवाने की कृपा करें।
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